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अनहत की समीक्षा:"सामाजिक यथार्थ की कहानियां” -सुरेश कुमार

 

युवा कथाकार राहुल देव का नवीनतम कहानी संग्रह अनाहत एवं अन्य कहानियां समाज की उन समस्याओं को उजागर करता है, जिन समस्याओं से वर्तमान का समाज जूझ रहा है। लेखक ने बड़ी सादगी के साथ देखे हुए यर्थाथ को अपनी कहानियों में उजागर किया है। संग्रह में लेखक की नौ कहानियां हैं। इनमें ‘मायापुरी’, ‘विजया’, ‘परिणय’, ‘नायंहनित न हन्यते!’, ‘एक टुकड़ा सुख’, ‘हरियाली बचपन’, ‘अनाहत’ और ‘रॉन्गनंबर’ है। इन कहानियों का ताना बाना लेखक ने मध्यवर्ग की समस्याओं और आंकाक्षाओं के ईदगिर्द बुना है। संग्रह की भूमिका वारिष्ठ आलोचक सुशील सिद्धार्थ ने लिखी है। वे मानते हंै कि इस संग्रह की कहानियां सामाजिक रचनाशीलता का नया आयाम प्रस्तुत करती हैं। संग्रही की पहली कहानी ‘मायापुरी’ कथनी और करनी का शिकार हुए एक युवा की कहानी है। यह कहानी लेखक ने लगभग आत्मकथ्य शैली में लिखी है। कहानी में एक ऐसा युवा है जो सीतापुर से मुंबई घूमने जाता है। मुंबई के बारे में जो उसने अपने मन में आदर्श गढ़े थे, वे वहां पहुंचकर खोखले साबित होते हैं। कहानी बताती है कि किस प्रकार गांव का आदमी अपने को शहर में जाकर ठगा और छला महसूस करता है। ‘विजया’ कहानी संतान की प्राप्ति में जूझ रहे एक पति- पत्नी की कहानी है। कहानीकार ने बड़ी मर्मिकता के साथ पति-पत्नी के दुख को उजागर किया है। इस कहानी का पात्र रवि चाहता है कि वह एक बच्चे को गोद ले, लेकिन समाज और परिवार के चलते वह ऐसा नहीं कर पाता है। एक दिन अचानक उसकी पत्नी सविता देखती है कि उसके घर के समाने कोई एक अबोध बच्ची को छोड़कर चला गया है। सविता उस बच्ची को अपनी संतान मानकर, उसे पालती और पोसती है। लेकिन रवि को यह बात अच्छी नहीं लगती कि उसकी पत्नी किसी और की संतान को पाले। इधर विजया धीरे-धीरे बड़ी हो रही थी। थोडे़ दिन के बाद यह पता चलता है कि विजया सुन नहीं सकती है। अंतत: विजया को दोनों पति-पत्नी अपनी बेटी मानकर अपना लेते हैं।‘परिणय’ कहानी स्त्री समस्या को केंद्र में रखकर लिखी गई है। स्त्री की समस्या क्या है? यह कहानी बताती है कि 21वीं सदी में भी स्त्री अपने हिसाब से पति का चुनाव नहीं कर सकती है। उसे अपने पिता या परिवार के लोगों द्वारा चुना गया जीवन साथी स्वीकार करना पड़ता है। कहानी की पात्र वैष्णवी मिलिंद नामक युवक से प्रेम करती है और उसी के साथ विवाह करके अपना जीवन बीतना चाहती है। इधर वैष्णवी के पिता उसके विवाह के लिए लड़के की खोज में लगे हुए हैं। वैष्णवी के ऊपर परिवार व समाज की इतनी बंदिश है कि वह पिता से नहीं कह पाती कि मिलिंद से विवाह करना चाहती है। वैष्णवी का विवाह जिस युवक से हो रहा है, दरअसल वह मिलिंद ही निकलता है। इस तरह लेखक ने कहानी को सुखद मोड़ देकर छोड़ दिया है।नायंहनित न हन्यते! कहानी रोजमर्रा की समस्या से मुठभेड़ करते एक शिक्षक के जीवन संघर्ष का आख्यान है। कहानी बताती है कि कोचिंग प्रबंधक किस प्रकार से शिक्षकों का शोषण करते हैं। कहानी के पात्र शिक्षक सत्यप्रकाश की छवि छात्रों के बीच एक ईमानदार और उदार शिक्षक की है। इसी व्यवहार के चलते उनसे कई छात्र जुडे़ हुए हैं। अमित अपने छात्र जीवन में सबसे ज्यादा उनसे प्रभावित था। अमित कई सालों बाद जब उनसे मिलने जाता है तो उसे यह जानकर बड़ा दुख होता कि अब वे नहीं हैं। अमित अपने गुरु के सिद्धांत को अपने आचरण में सदा के लिए ढाल लेता है। ‘परिवर्तन’ कहानी में लेखक ने गांव में हो रहे भेदभाव की समस्या को उठाया है। यह कहानी खुलासा करती है कि देश को आजादी मिलने के बाद भी समाज में ऊंच-नीच और जाति-पाति की भावना विद्यमान है। ‘एक टुकड़ा सुख’ कहानी में गरीबी की समस्या को उठाया गया है। लेखक ने लालचंद के बहाने गरीबी में पिसते हुए लोगों की पीड़ा को सामाजिक पटल पर उजागर किया है। ‘हरयाली बचपन’ कहानी में लेखक ने उन बच्चों की समस्या को उठाया है, जिनका बचपन यातनाओं में गुजर रहा है। कहानी बताती है कि बच्चों का शोषण करने वाले असामाजिक समाज में मौजूद हैं। इतना ही नहीं, बच्चों को बालश्रम, अशिक्षा, कुपोषण और सामाजिक भेदभाव जैसी समस्या से गुजरना पड़ता है। ‘अनाहत’ प्रेम की निष्ठा और उसके त्याग की मर्मिक कहानी है। इस कहानी संग्रह में व्यक्ति और उससे जुड़ी समस्या का स्वर सुनाई देता है। अनाहत एवं अन्य कहानियां संग्रह समाजिक प्रश्नों को टटोलते हुए आगे बढ़ता है। लेखक ने बड़ी सूक्ष्मता से समाज के यथार्थ को सामने रखते हुए संकीर्ण मानसिकता रखने वालों पर कुठाराघात करता है। संग्रह की कहानियां कथ्य और शिल्प की दृष्टि से मजबूत कही जा सकती हैं। कहानियां बोझिल न होकर, सरल व रुचिकर लगती हैं।

पुस्तक : अनाहत एवं अन्य कहानियां, कथाकार : राहुल देव, मूल्य : 60 रुपए, प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, एफ-77, सेक्टर-9, रोड नं.11, करतापुरइंडस्ट्रियल एरिया, जयपुर


उधेड़बुन की समीक्षा:"अँधेरे से बाहर उम्मीद और रौशनी की कवितायेँ”

 

‘उधेड़बुन’ हर सजीव प्राणी के अन्दर कभी न कभी अवश्य होती है | छोटे लोगों के पास अपनी छोटी उधेड़बुनें हैं तो बड़े बड़े लोग बड़ी बड़ी उधेड़बुनों में लगे हैं | इस क्रम में युवा कवि राहुल देव का आया पहला कविता संग्रह ‘उधेड़बुन’ शैशव से लेकर युवाकाल तक की तमाम चिंताओं का चित्र देती है | इस कविता संग्रह को हाथ में लेते ही सर्वप्रथम शीर्षक पर ही मेरी निगाह ठहर गयी, शीर्षक अपने अर्थों में व्यापक है क्योंकि आज के इस कठिन समय को देखते हुए मनुष्य की दुश्चिंताओं के अन्दर चलने वाली यह एक अनवरत प्रक्रिया है | ठीक इसी प्रकार किशोरावस्था में रची गयी ये कवितायेँ जबकि कवि स्वयं को किसी निश्चित बिंदु पर ठहरा हुआ नहीं पाता तब उसकी कविता अपने आंतरिक और बाह्य संसार से जूझकर अपनी एक अलग राह स्वयं निर्मित करती है | राहुल अपने प्रारंभ से ही चीज़ों को ‘उधेड़ते’ और ‘बुनते’ रहे हैं और ऐसा मैं निश्चित रूप से इसलिए भी कह पा रहा हूँ क्योंकि मैं इस कवि के जन्म से लेकर अब तक के निजी जीवन का साक्षी रहा हूँ |
इस संग्रह की पहली कविता व्यष्टि को समष्टि में तिरोहित करती दिखाई देती है | तो संग्रह की दूसरी ही कविता एक लम्बी कविता है | ‘छद्मावरण’ शीर्षक से इस लम्बी कविता में जीवनानुभूति का विडंबनात्मक, व्यंग्यात्मक चित्र है | पूरी कविता से गुजरने के बाद लगता है कि कवि में चरित्र चित्रण और चरित्र के अंतर्द्वंध की गहरी पहचान है | यह कविता यथार्थ का कटु व सजीव अभिव्यक्तिकरण है | एक लम्बी छन्दमुक्त कविता में निरंतर एक व्यक्ति के अंतःकरण और बाह्य जीवन का द्वंद्व चित्रित करना कवि की एकाग्रता और सघन अध्ययन का परिणाम है | इस कविता को पढ़ते हुए अपनी कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं, “पैरों में पादुका पहन कौन जान सका-/ धूल गर्म होती है कौन पहचान सका/ क्षुधा तृप्त होने पर भूख एक संभ्रम है/ असफल व्यक्तियों की पीर कौन जान सका ?” इस एक कविता में दूसरा जन्म भी ले आना केन्द्रीय चरित्र का चरित्र चित्रण की शक्ति और वर्णनात्मक क्षमता से युक्त है राहुल की कलम | थोड़ा ध्यान से पढ़ने पर मुझे तीन जन्मों की कथा मिलती है एक कवि चरित्र की | एक कविता में तीन जन्मों का लेखा-जोखा कम शब्दों में सिद्ध करता है कि कविता में सूक्ति शक्ति का सफल प्रयोग हुआ है | कविता के अंत में किया गया व्यंग्य तीखा है तथा धर्माधीशों को चुभेगा जब कवि लिखता है कि, “प्रसाद रुपी मिष्ठान्न/ तुम्हें सिर्फ सुंघाया गया/ तुम कुछ नहीं कर सकते थे/ लार घोटने के सिवा” |
अगली कविता ‘सपने की बात’ को भी एक लम्बी कविता की श्रेणी में रखा जा सकता है | इस कविता में कवि अपने व्यक्तिगत जीवन की समस्याओं का समाधान सपनों में पाता है | सपनों की यह दुनिया बड़ी रूमानी है और यथार्थ से संपृक्त भी | इस कविता में वह सपनों के माध्यम से रोमांस, विवाह और देहान्तरण जैसे विषयों को एक साथ पिरो ले जाता है | ‘पतझड़ के बाद’ शीर्षक कविता इस संग्रह की एक दार्शनिक कविता है | विद्वानों का मत है कि हर दार्शनिक कवि नहीं होता लेकिन हर सच्चा कवि दार्शनिक होता है | उम्र के जिस दौर में यह कवितायेँ रची गयी है अपने भरपूर अनगढ़पन को लिए हुए कहीं कहीं हमें सहसा चकित भी करती हैं | मुझे तो लगता है कि शायद कवि को खुद भी भान नहीं रहा हो कि कई जगहों पर वह कितनी बड़ी बात कर गया है | कविताओं में भाव और विचारों का अद्भुत संतुलन है |
जहाँ ‘ओह कामना वह्नि’ कविता को पढ़ते हुए दिनकर की पंक्तियाँ याद आती हैं, “कामना वह्नि की शिखा/ मुक्त मैं अनवरुद्ध/ मैं अप्रतिहत, मैं दुर्निवार !” वहीँ ‘मौन व्यथा’ शीर्षक कविता में, “अरे यायावर !/ तू महान है/ तेरी व्यथा, तेरी ख़ुशी/ रूप में सब कुछ की तरह/ समाई सारतत्व गीता की तरह...” लिखकर कवि ने नवीन उपमान का प्रयोग किया है | ‘चिंतन’ शीर्षक कविता में राहुल एक दार्शनिक की तरह संसार और अंतर्जगत को देखते हैं | बचपन, किशोरावस्था और युवाकाल की भूमि तक आते आते ऐसी गद्यात्मक कविताओं की रचना संकेत करती है कि राहुल को भविष्य में अच्छा गद्यकार बनने की पूरी सम्भावना है | संग्रह में आगे की तमाम कविताओं को पढ़ते हुए यह भी लगा कि राहुल के अन्दर के आलोचक को समझने के लिए बुद्धि प्रधान अध्ययन आवश्यक है पाठक के लिए क्योंकि कहीं कहीं पर राहुल का वैचारिक गुम्फन बहुत जटिल है, उन्हें समझने में ‘वाक्यं रसात्मकं काव्यम’ सहायता नहीं करता है | राहुल इस बौद्धिक युग के बौद्धिक कवि हैं जिसने अपने जीवनानुभवों और अपने प्रतिसंसार को अपनी इन कविताओं में उतारा हैं |
आज की काव्यभाषा में कहें तो एक आध्यात्मिक अभिव्यक्ति है ‘विश्वनर से’ शीर्षक कविता तो ‘कर्म’ शीर्षक कविता में कर्म की सहज अभिव्यक्ति की गयी है कर्मकार के चरित्र से जो किसी भी देश की वास्तविक शक्ति होता है | ‘नवजीवन’ में कवि एक नूतन संसार की कल्पना में रत है | यहाँ पन्त की पंक्तियाँ याद आती हैं, “अये विश्व के स्वर्ण स्वप्न- संसृति के प्रथम प्रभात !” ‘अंतर्द्वंध’ कविता में सच्ची मनुष्यता की तलाश दिखलाई पड़ती है | ‘प्रतीक’ अपने आप में एक प्रतीकात्मक शब्दचित्र है तो एक नारी मन का, उसके जीवन की विडम्बनाओं का शाब्दिक चित्र है ‘सेज’ | ‘ओस की वह बूँद’ व्यष्टि से समष्टि’ के बीच रिश्ते को व्यक्त करती है और लघुता की निजता में पारावार की विराटता के दर्शन देती है | ‘परख’ कविता कहती है कि चीज़ों को ज्यादा परखते परखते मनुष्य अपना उद्देश्य भूल बैठा है | एक शायर कहता है, “परखना मत परखने से कोई अपना नहीं रहता/ किसी भी आईने में आपका चेहरा नहीं रहता |” ‘पाप’ कविता पर अमर उपन्यासकार भगवती बाबू की लाइन जोड़ता हूँ, “न हम पाप करते हैं न पुण्य करते हैं | हम वही करते हैं जो हमें करना पड़ता है |” ‘रहस्य’ को हर लेखक, कवि, विचारक जानना चाहता है, राहुल भी उनमें एक हैं लेकिन जन्म से पहले और मृत्यु के बाद सिर्फ अनबूझा रहस्य ही है और वह अभेद्य है | ‘पथिक भ्रमित न होना’ कविता कवि की अपनी कठोर यात्रा से दूसरों को भी कठोरताओं से न घबराने का सन्देश है क्योंकि कहीं न कहीं तो ठौर मिलेगा ही, आशियाना छोटा सा बनेगा ही | कविता में आशावाद है | विलियम वर्ड्सवर्थ कहता है- “चाइल्ड इज द फ़ादर ऑफ़ मैन” किसी बच्चे को एकलव्य न होना पड़े राहुल इस कविता ‘बच्चे और दुनिया’ में प्रस्तुत करते हैं | ‘सिर्फ कविता के लिए’ शीर्षक कविता सिद्ध करती है कि कवि के लिए तो अब उसकी कविता, उसका जीवन बन चुकी है | ‘सौन्दर्य’ कविता को कीट्स की लाइनों से जोड़ता हूँ, “ए थिंग ऑफ़ ब्यूटी, जॉय फॉरएवर” तो ‘बकरी बनाम शेर’ विडंबनात्मक व्यंग्य है इस युग का | ‘आधा सच’ शीर्षक कविता आज के चलते हुए मुहावरों के प्रयोग के लिए एक अच्छा उदाहरण है | गली-कूंचों और सड़कों पर बहते-फैले वाक्यांशों को अपनी रचना में सुगठित ढंग से प्रयोग कर ले जाना मैं कवि की कलम की सफलता मानता हूँ | ‘भ्रष्टाचारम उवाच’ में एक ईमानदार आत्मा, बेईमानी, जालसाजी जैसे हवाले और घोटाले स्पष्ट रूप से दिखाई दिए हैं, “मैं बदनीयती की रोटी संग मिलने वाला/ फ्री का अचार हूँ/ पॉवर और पैसा मेरे हथियार हैं/ मैं अमीरों की लाठी/ और गरीबों पर पड़ने वाली मार हूँ !” उपरोक्त पंक्तियों में भ्रष्टाचार पर बिलकुल नूतन उपमान हैं |
‘अक्स में ‘मैं’ और मेरा शहर’ इस किताब की एक महत्त्वपूर्ण कविता है | कवि के तेवर इस कविता में देखते ही बनते हैं | राहुल लय, सुर, ताल के बंधनों से आज़ाद हैं लेकिन जिंदगी को देखने के लिए उनके पास बाह्य चक्षुओं के साथ अन्तः चक्षुओं की शक्ति काफी प्रबल है | इस कविता को पढ़ते हुए नीरज याद हो आए, “कदम-कदम पर मंदिर मस्जिद/ डगर-डगर पर गुरूद्वारे/ भगवानों की बस्ती में हैं ज़ुल्म बहुत इंसानों पर |” राहुल का कवि मानववादी है | कवि की अन्तः और बाह्य यात्राओं का सघन गुम्फन देखने को मिलता है इस रचना में | ‘कविता और कविता’ में ठूंठ से कोंपलों का फूट पड़ना नया उपमान है इसी तरह जंगल में झाड़ियों का उग आना भी नूतन उपमान है | ‘हारा हुआ आदमी’ कविता अपने सशक्त कथ्य के कारण अपने अर्थ में बहुत दूर तक ध्वनित होने वाली कविता है | इस कविता ने मुझे वैचारिक स्तर पर बड़ा आंदोलित किया | इस संकलन की आख़िरी कुछ कविताओं में वह कविता में प्रतिरोध भी रचते हैं | राहुल की कविताओं को पढ़ने के साथ साथ मैंने उन्हें कई गोष्ठियों में सुना भी है | उनकी शैली बड़ी मौलिक और प्रभावी है | राहुल सच को स्पष्ट शब्दों में बगैर किसी दुराव-छुपाव के सच कहने की हिम्मत रखते हैं | उनकी साफगोई मुझे अच्छी लगती है | वह अपनी कविताओं में कई बार ऐसे विषय भी उठा लेते हैं जिनके बारे में आज कोई समकालीन कवि लिख ही नहीं रहा | ‘अनिश्चित जीवन : एक दशा दर्शन’ में जीवन और मृत्यु जैसे जटिल विषय को कविता में समझने और खोलने का ऐसा ही एक प्रयास है | अंग्रेजी का निबंधकार स्टील कहता है औसत तीस वर्ष की उम्र के पहले मृत्यु के बारे में कोई सोचना नही चाहता | संस्कृत साहित्य के गर्भित सूक्ति वाक्यों के साथ इस संसार के दो छोर नापने की कोशिश करने वाले इस युवा कवि को समकालीन कविता में कमतर करके नहीं आंकना चाहिए |
विज्ञान की भाषा में मन कहाँ है लेकिन फिर भी अमूर्त मन है सबके पास | ‘मेरे मन’ शीर्षक कविता में कवि का वही मन एक साथी की तलाश में है | ‘प्रेम पथ का पथिक’ कविता को मैं अपनी कविता की कुछ पंक्तियों से जोड़ता हूँ, “जब-जब पूनम के चंदा ने/ हृदय उदधि में ज्वार उठाया/ ऊँची उठी तरंगें/ तुम तक तो मैं पहुँच न पाया !” संग्रह में ‘अंतिम इच्छा’ शीर्षक कविता कवि के अपने समय से आगे बढ़कर लिखी गयी कविता है | इस कविता को पढ़कर अंग्रेजी कवि राबर्ट ब्राउनिंग की कविता ‘लास्ट राइड टुगेदर’ कविता याद आती है | यह उदात्त भावनाओं की एक मार्मिक रचना है | एक शराबी की खराबी संवेदनापूर्वक चित्रित की गयी है ‘नशा’ शीर्षक कविता में, बिम्बधर्मिता कमाल की है | ‘अपराधी’ कविता में किसी व्यक्ति के आतंकवादी बनने का मनोविज्ञान है और गाँधी की पंक्ति ‘पाप से घृणा करो पापी से नहीं’, से रास्ता भी सुझाता है कवि | ‘सज्जनों के लिए’ कविता युगबोध को दर्शाती है और कहती है कि सज्जन लोग यदि प्रैक्टिकल न हुए तो आज की दुनिया उन्हें निगल जायेगी | ‘कौन तुम’ कविता में स्थूल और सूक्ष्म, आत्म एवं परमात्म सत्ता का स्वरुप देखा जा सकता है | ‘मेरे सृजक तू बता’ शीर्षक अपनी कविता में कवि कहता है, मन से सुनने वालों की कमी है | सुनने वाले तो मिल भी जाएँ लेकिन भावन करने वाले लोग बहुत कम हो गये | कविता छोटी है लेकिन मारक है | फ़िराक साहब की दो लाइनें अनायास याद आती हैं, “न समझने की बातें हैं- न समझाने की बातें हैं/ जिंदगी नींद है उचटी हुई दीवाने की |”
‘ये दुनिया : ये जिंदगानी’ नए उपमानों की दृष्टि से अच्छी कविता कही जायेगी | वर्ण्य विषय के साथ जैसे सायकिल के ट्यूब का पन्क्चर, गैस के सिलिंडर का ख़त्म होना, कमरतोड़ महंगाई और जनसँख्या बराबर पीठ पर लदा नटखट बच्चा | इन नवीन उपमानों को उदृत करने का कारण यह है क्योंकि यह लिखने वाले के नूतन उपमान हैं | नूतन उपमानों को लाने का कार्य अज्ञेय ने किया अतः कवि प्रगतिशील होने के साथ साथ प्रयोगधर्मी भी है | ‘एक टुकड़ा आकाश’ कविता में खण्डों में बंटा हुआ जीवन लगभग हर पहलू को स्पर्श करता है | जितना कुछ कवि की दृष्टि में आ गया है वह इस कविता के टुकड़े में समाया है | ‘राजस्थान की एक लड़की’ में कवि राहुल की सूक्ष्मता से देखने वाली आँखें और संवेदनशील विशाल हृदयता के दर्शन होते हैं | डाल से बिछुड़ी हुई टहनी, झुण्ड से बिछुड़ा हिरन जैसी बातें भी याद आ जाती हैं इसको पढ़कर | अंत में उसे लोगों की संकुचित मानसिकता पर कटाक्ष करते हुए उसे भारत की बेटी कहकर कवि कविता में अपने निर्वाह तत्व का लक्ष्य एक सीमा तक पूरा कर लेता है | ‘शहर की सड़कें’ शहरों में दिन-प्रतिदिन होने वाले हादसों के प्रति सड़कों पर गुज़रते राहगीरों की असंवेदनशीलता का चित्र है लेकिन इसके लिए भारत की बढ़ती जनसँख्या, कानूनी पेचीदगी भी तो ज़िम्मेदार है | कविता पाठक को अपने अंत के साथ विचलित कर देती है जब पता लगता है कि सड़क की हर एक घटना अगले दिन के अखबार की ख़बर से ज्यादा कुछ नहीं |
‘महाप्रलय’ शीर्षक संग्रह की एक महत्त्वपूर्ण कविता पढ़कर मुझे एस.टी. कोलरिज की ‘राइम ऑफ़ द एशियेंट मारिनर्स’ याद आ गई | मैं जानता हूँ कि राहुल विज्ञान के विद्यार्थी रहे हैं अतः अंग्रेजी की यह कविता उन्होंने नहीं पढ़ी होगी फिर भी उस कविता जैसा कुछ तत्व मुझे इसमें दिखा | मैं यह इसलिए भी लिख रहा हूँ क्योंकि दुनिया भर के कवि दिलों में ऐसी बातें आती हैं | हाँ मानता हूँ कामायनी का जल-प्लावन कवि की चिन्तना में जरूर समाया होगा | समकालीन कविता समय में ऐसी श्रेष्ठ कवितायें भी रची जा रही हैं देखकर हिंदी कविता के सुखद भविष्य की आश्वस्ति होती है | कविताओं में कहीं कहीं आई सपाटबयानी राहुल की अपनी निजी है | ‘अनहद नाद’ जैसी कविता में कवि की जनपक्षधरता का सहज आभास मिलता है | इस कविता के माध्यम से कवि प्रस्तुत करता है चित्र उस व्यक्ति का जो समाज के सबसे निचले पायदान पर पहुँच कर भिखारी हो गया है, यह सामाजिक सरोकार की कविता है|
‘गाँव से शहर तक’ में कवि प्रेमचंद के गाँव खोज रहा है | ग्रामीण मानसिकता में भी शहरों का बढ़ता हुआ जंगल का मीठा जहर घुस गया है जोकि आज का कड़वा सच है | अपने कालखंड के भौगोलिक परिवर्तन पर भी कवि की नज़र है | कवि जैसा होता है, कवि राहुल स्वयं कवि है इसलिए ठीक नपे-तुले वाक्यांशों में इसे सिद्ध करते चले गये हैं और ‘कवि ऐसा होता है’ एक सार्थक कविता बन जाती है | कहा जाता है प्रेमी, पागल और कवि एक जैसे होते हैं, अगर वे नकली नहीं होते तो पथान्वेषी होते हैं | टेनिसन कहता है, “चेंज इज द लॉ ऑफ़ यूनिवर्स” कवि राहुल फूलों को यह शाश्वत परिवर्तन बताना चाहते हैं अपनी ‘परिवर्तन’ शीर्षक कविता में | दलदल बहुत प्रकार का होता है और राहुल की ‘दलदल’ शीर्षक कविता जीवन के बहुआयामी दलदल का चित्र प्रस्तुत करती है | यह कविता अपने अर्थों में एक बड़े कैनवास की ओर संकेत करती है | उनकी कुछेक कविताओं में शब्दस्फीति थोड़ी ज्यादा है, शिल्प भी कहीं कहीं टूटता है और कहीं-कहीं पर संस्कृत तथा अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग भी मिलता है | चूँकि यह संग्रह कवि की काव्ययात्रा के प्रारंभ की घोषणा करता हुआ आया है अतः काव्यशास्त्रीय या आलोचकीय दृष्टि से इस पक्षपर बहुत ज्यादा विवेचन किया जाना उचित नहीं प्रतीत होता | संग्रह की अंतिम कविता ‘एक आस्तिक की स्वीकारोक्ति’ में कवि अंग्रेजी के दो हस्ताक्षरों के समीप पहुँच जाता है, वे हैं टैनीसन और टॉमस हार्डी क्योंकि ये दोनों प्रकृति को वर्ड्सवर्थ की तरह नहीं देखते हैं | “सारा तंत्र ही भ्रष्ट है/ समय का फेर है/ यह उबाल कैसे न आता/ जब नदी का पानी/ खतरे की रेखा से ऊपर बह रहा हो !” कविता की उपरोक्त पंक्तियाँ हर विवेकशील को सोचने पर विवश कर देती हैं | प्रकृति का शत्रुवत व्यवहार, सृष्टि के प्रति, विधि-विधान और नियतिवाद से गुज़रता हुआ कवि ऐन्द्रिक संसार अंगों के कार्य व्यापार को खोलता जाता है | कवि आस्तिकता की परम्परागत बेड़ियों को अपने तर्कों से तोड़कर आस्था का अपना एक नया मानदंड निर्मित करना चाहता है | कविता में स्त्री-पुरुष के संबंधों पर अपनी सोच के अनुसार कवि का मौलिक विश्लेषण भी सामने आता है |
समग्रतः कहा जाए तो राहुल अपनी सीधी, सरल भाषा में दोनों, भावों और विचार के स्तर पर बहुत गहरे तक प्रभावित करते हैं | 112 पृष्ठ के इस संग्रह का मूल्य बहुत ही कम मात्र 20 रुपये है | इलाहाबाद के अंजुमन प्रकाशन ने काफी कम समय में साहित्य सुलभ संस्करण जैसी साहित्यिक पुस्तकों का प्रकाशन कर के प्रकाशन जगत में अपनी एक सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है | हिंदी साहित्य के पाठकों के लिए शुरू की गयी यह एक अच्छी शुरुआत है | अच्छे साहित्य को चाहने वालों को इस युवा कवि की कविताओं का आस्वादन और स्वागत अवश्य करना चाहिए |

- विनोद कुमार
उपाध्यक्ष ‘निराला साहित्य परिषद्’
महमूदाबाद (अवध) सीतापुर (उ.प्र.) 261203


श्रीप्रकाश के कविता संग्रह ‘सौरभ’ पर दिनेश सोनी की समीक्षा

 

कविवर श्रीयुत श्रीप्रकाश जी द्वारा विरचित काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ यह अपार हर्ष का विषय है | बिना कुछ पिछला लिखे आगे लिखा नहीं जा सकेगा | अतः यह आवश्यक समझ अपनी बात कह रहा हूँ | मेरा सम्बन्ध निराला साहित्य परिषद् से ‘सप्त स्वर’ के प्रकाशन से कुछ समय पूर्व हुआ था | सभी कवि स्थानीय होने के कारण शीघ्र ही आत्मीय भी बन गये थे | ‘सप्त स्वर’ के प्रकाशन की भूमिका बनी और सफ़ल प्रकाशन व लोकार्पण हुआ | विषयांतर और विस्तार के कारण उस पर चर्चा नहीं करूँगा किन्तु यह प्रकाशन परिषद् के लिए मील का पत्थर साबित हुआ यही वास्तव है |
मैं कोई समीक्षक नहीं वह तो विद्वान् हुआ करते हैं | हाँ इतना अवश्य है कि जब कोई पुस्तक पढ़ता हूँ तो उसकी प्रतिक्रियास्वरूप अपने हृदय की बात कह देता हूँ | श्रीप्रकाश जी प्रायः अपनी रचनाएँ कम ही सुनाते थे | उनपर प्रसाद व निराला का सम्यक रूप से प्रभाव देखा जा सकता है | प्रस्तुत काव्य संग्रह में प्रकाशित रचनाएँ जो प्रथम खंड में संग्रहीत हैं मेरी सुनी हुई नहीं हैं | मैंने श्रीप्रकाश जी का यह रूप नहीं देखा था | श्रीप्रकाश जी शब्दों के मितव्ययी हैं अतः वे थोड़े में ही कहना जानते हैं | यह उनकी विशेषता है | दैन्य भाव से ‘मां वर दे’ वाणी वंदना में कवि ने वह सबकुछ पा लिया है जो एक कवि को चाहिए | चरणों की आभा के अतिरिक्त और क्या चाहिए, इसके पश्चात जीवन का उत्तरोत्तर विकास निश्चित हो जाता है | ‘वाह री दुनिया’ में इससे सूक्ष्म व्याख्या और क्या होगी किन्तु मजबूरी में फरसा लिए क्या सन्देश देती है यह स्पष्ट होता तो क्या बात थी |
‘दीपक से’ सत्य की आभा से भारत भूखंड को आलोकित करने का आह्वान वह भी लोक हितार्थ जिसमें देर न करने का अनुरोध | ‘उसी को’ कविता में श्रीप्रकाश का आध्यात्म दर्शन प्रतिलक्षित होता है | हाँ प्रतिलक्षित परिवर्तन अपने पास रख लिए एक पहेली की तरह | जगत नियंता से सत्य का मार्ग पूछने वाला बटोही कवि कभी प्रकाश और आभा की बात करता है तो कभी सत्यम शिवम् सुन्दरम की | लोककल्याण ही तो उसका अभीष्ट दिखता है | ‘मुक्तांगन’ में कालिदास के मेघदूत का निस्यंद, विरहरत कवि शून्य में प्रेयसी की खोज़ करना चाहता है | संभव है कि मुक्तांगन गुलज़ार हो सके |
‘जीवन क्षणिक है’ में कवि ने युधिष्ठिर की तरह यक्ष प्रश्न को हल करने का प्रयास किया है | सत्कर्म, दुष्कर्म, उपदेश, ब्रह्माण्ड, जीव. सत, असत, आत्मा, परमात्मा और इस संसार सागर का मंथन करते हुए निस्सार शून्य पर ठहरकर प्रत्येक को सोचने पर विवश कर लेखनी को विराम देता है | ‘अंतर संसार’ में नाना रूपों और प्रश्नों की कुहेलिका जड़ चेतन के प्रश्न और उत्तर तलाशती कहाँ है शांति एक जटिल प्रश्न है जिसकी खोज़ में प्राणी युगों-युगों से भटक रहा है | यही परिवर्तन का मूलमंत्र है | ‘लिख दे’ में कवि ने लेखनी से वह सबकुछ लिखने को कहा है जो कल्पना, यथार्थ, जीवनहितार्थयहाँ तक कि जीवन के बहुआयामी व संसार के बहुरंगी चित्रान्तुरक्ति की विकल सीमा में कवि की आत्मा अपने पूरे दर्शन समाज के दर्पण में करती है और आहत होने पर भी असंख्य टुकड़ों में प्रतिबिंबित हर्ष, विषादको जीवन सरिता के चंचल प्रवाह को लिखने का साहस बटोरकर दृढ़ता से खड़ा है |
‘अन्दर टटोल’ में कवि आत्माभिमुख हो चरैवेति का मन्त्र देता है वही जीवन की सार्थकता है | अंतर के समग्र विकास से सबकुछ सुलभ होगा ऐसा उसका दृढ़विश्वास है | यही नहीं सत्य की खोज़ भी वह इसी मार्ग पर चलकर करने हेतु प्रयासरत दिखता है | ‘उधर भी देखूं’ कविता ज्ञानालोक हेतु ईश्वर की प्रार्थना करता है जिसके बल से वह जीवन की विकटतम कठिनाइयों से दो दो हाथ करना चाहता है | वह किसी राहत की चाह किये बिना विपक्ष की आँखों में आँख डालकर देखने की सामर्थ्य रखता है |
‘मम स्वार्थ’ की बात कहकर ईश्वर से परस्पर हितार्थ की बात कहता है | भक्ति का यह सखा भाव है जो अच्छा लगता है | तो मेरे अपने, मैं चलता, एक दिन शीर्षक कवितायेँ मन को टटोलने को विवश करती हैं | कविता-1 में कवि ने कविता के सर्जन की बात की है इसे परिभाषा मानं लेने में क्या हानि हो सकती है |
परिवर्तनशील संसारे मृतः को वा न जायते के समान्तर किन्तु विपरीत धारणा है यहाँ वस्तुओं का रूप बदल जाता है यह वैज्ञानिक सत्य है किन्तु कवि ने अंतिम सत्य के रूप में नया पाना चाहा है | आदि और परम्परा का स्पष्ट मानक तैयार किया गया है ‘परम्परा’ में | जिसमें भूत, वर्तमान और भविष्यत् की श्रृखला को सद्गुणों से तोड़ने का प्रयास या यूँ कहें कि सफ़ल प्रयास है | मेरी समझ से स्वप्न में सत्य को खंगालना ही ‘अंतर्द्वंध’ है |
वृक्ष कबहूँ नहिं फल भखै नदी न संचय नीर | निष्काम कर्म द्वारा ऐसा ही कुछ कहा है कवि ने | द्वैत अद्वैत की बात यदि अर्चना के माध्यम से ही कही गयी है तो आश्चर्य कैसा? संभ्रम के माध्यम से कवि अलौकिक वातावरण में जाना अवश्य चाहता है किन्तु भुलावा देकर नहीं | यहाँ प्रीतम पर विश्वास करने की आवश्यकता है क्योंकि प्रेम और विश्वास एक दूसरे के पूरक हैं | ‘सद्गति दे’ दीपक के जलने पर कज्जल व धूम तो अवश्यम्भावी है | सुख दुःख में समान रहने का विवेक यदि है तो यह सहज ही समझ आ जायेगा कि काजल किसी के चरित्र व जीवन पर अलग-अलग रूप में प्रभाव डालता है बस उसके अभीष्ट की भावना शुभ हो |
‘भूखा’ में दो बिम्ब निराला जी की उस कविता की याद दिलाते हैं यथा- वह आता/ दो टूक कलेजे के करता/ पछताता, पथ पर आता आदि अनेक प्रश्न मानस पटल पर उभरते हैं | घर आता, सो जाता | काश ! अगले दिन ऐसा न होता | ‘वाह रे’ मनुष्य मानवयंत्र बनकर रह गया है | प्रगति मिली किन्तु विषफल के रूप में – ‘पी रहा बस पी रहा/ अमृत सरीखा विष’ और अर्थ का इतना महत्त्व कि मनुष्य केवल पैसे के लिए जी रहा न कि जीवन यापन के लिए पैसा कम रहा है |
‘नए जनपद’ में कवि की आशा साफ़-साफ़ दिखती है | छाएगी इक दिन उजाली रात/ मुझसे हो गयी है बात | प्रत्यक्ष वार्ता रहस्यवाद की ओर इंगित करती है | नेति-नेति का चिंतन कम होगा तो आकुलता स्वाभाविक है | उत्तर तो स्वयं में ही मिलेंगें ऐसा मेरा मानना है | ‘वह वारतिय’ कवि के मानस को झकझोरती है | प्रसाद की श्रद्धा का क्षरण देखते ही वह विकल हो जाता है | तभी तो कहता है, मर्यादा के बंधन तोड़ो | कहकर क्रांतिबीज बोने का कुतूहल है | ‘भिखारिन’ को देखकर उसका कराहना धूल में बिखरे चावल व्यंग्य करते हुए इससे अच्छा उदाहरण कोई हो ही नहीं सकता – ‘धूल में वैसे मिले कि जैसे कि/ दुःख में व्यंग्य करता व्यक्ति कोई हंस रहा हो !’
‘पथरकट्टा’ में निराला की ‘वह तोड़ती पत्थर’ की झलक जिसमें कर्म की निष्कामता भले ही न हो किन्तु कठिन कर्म व जीवन की विद्रूपता अवश्य दिखती है | ‘एकांत में’ स्वस्थ्य चिंतनशील व्यक्ति इसी प्रकार सोचता है और यह उसके प्रति कृतज्ञता का अच्छा भाव है | आत्म दीपो भव ‘आप में’ दिखाई देता है | कवि आत्मालोक में समस्त जग को देदीप्यमान देखना चाहता है |
‘मति वर दे’ यह वाणी वंदना, ‘वर दे वीणा वादिनि से कुछ सीख लेते हुए प्रतीत होती है गठन में | ‘आत्मपरिचय’ या यूँ कहें कि हृदय में वह छायाबिम्ब जिसके लिए कवि विकल दिखता है | न मिलता चित्र का आभास, यही विभ्रम है | जिसमें पड़कर मनुष्य स्वयं से दूर हो जाता है तो कह उठता है ‘कौन तू मेरे हृदय में’ | इसी प्रश्न का उत्तर अगली कविता 2 में मिलता है | प्रेम की रसधार ही संसार को डुबोने का सामर्थ्य रखती है |
प्रायः जिस सत्ता से सीधे बात होती है उसमें बाधा यामिनी हो या कोई अन्य | भोर तो सुनिश्चित होता है | इसीलिए सजग हो जीवन नौका उसी को सौंपने का मन बनाना अच्छी बात है | ‘अभागा’ पराजय नहीं जीवन का कडुवा घूँट है जिसे पीकर कोई भी इसी तरह के प्रश्नों में उलझकर रह जाता है | इसी भाव की पूरक कविता ‘सम्बन्ध’ में सहज ही देखा जा सकता है | ‘घूरा’ मात्र कचरे का ढेर हो ऐसा नहीं है | वह तो ऊर्जा का स्त्रोत होता है, सहनशक्ति की पराकाष्ठ है तभी तो प्रायः सहनशील व्यक्ति को ‘घूर’ की संज्ञा दी जाती है अतः उसके डांटकर बोलने की बात असहज है |
मुक्तक/गीत खंड
सप्त स्वर का एक स्वर जब स्वर को परिभाषित करेगा तो स्वर की सिद्ध परिभाषा ही निकलकर आएगी | अंतर की करुणा को अनुभूत करना सच्चे अर्थों में कविता है | रही किधर बहने की बात तो इसका निर्धारण कल्पना में नहीं वरन यथार्थ में जीकर ही हो सकता है | विश्वास के बिना सृजन की कल्पना भी नहीं की जा सकती और जब इसकी धुन हो क्या पर्वत क्या आंधी क्या दुर्गम पथ | हृदय की करुणा यदि बहेगी तो – उमड़कर आँखों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान | यही सत्य है | यही नियति है और यही अभिव्यंजना भी |
कहने को ये पांच मुक्तक भले ही अलग हो किन्तु समग्र रूप से यह प्रेम और जीवन का गीत है जिसमें सम्पूर्ण जीवन का परिदृश्य दिखता है | चाह में चेतना राग में दीपक का प्रेम किन्तु घुटन का अभिप्राय संभवतः विश्वास के लुटने से पीड़ादायी अवश्य हो गया है किन्तु जीवन में सत्य को दृढ़ता से स्वीकारना ‘नेह बदले में तनिक सा ले लिया था’ अच्छा लगता है |
दिनकर की पंक्तियाँ – दो राह समय के रथ का घर्घर नाद सुनो’ याद आ जाती है | ये चार मुक्तक लोकक्रांति की ज्वाला से ज्वलंत समग्र क्रांति को अपने में समेटे वास्तव में जन-जन की पीड़ा नहीं ओजस्विता है | कवि से भी मानवता हित में रक्तदान की अपेक्षा की गयी है | ‘धरती प्यासी है उस मानव के श्रोणित की/ जिसके अंतर में लोकप्रेम की कविता है/ धरती प्यासी है उन कवियों की कविता की/ जिनके अंतर में लेशमात्र मानवता है |’ अर्थ और यथार्थ को स्वीकारने की बात है | मानव अर्थवादी होकर अनर्थ करता ही जा रहा है | शिक्षा व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह ही नहीं पूरी व्यवस्था ही प्रश्नों के घेरे में है | कच्चा-चिट्ठा है यह बिगड़ी हुई शिक्षण प्रणाली का – ‘है नहीं बस छात्र जन की बात/ गुरुजनों में दोष पाए जा रहे हैं’ और ‘अर्थ मानव ने लिया जब से जनम/ चाकरी के हित पढ़ाया जा रहा है |’
‘स्मृति’ को पढ़कर बाबू जयशंकर प्रसाद के ‘आँसू’ की याद आती है | कवि ने स्मृतियों को उसी प्रकार व्यक्त किया है जैसा कि आँसू में | मैं कह नहीं सकता किन्तु संभव है कवि ने स्मृति खंडकाव्य ही लिखा हो | यहाँ स्थानाभाव के कारण कुछ अंश प्रकाशित कराये गये हों | यह एक स्वस्थ रचना है जिसमें सम्पूर्ण जीवन जीने की परिकल्पना है स्मृतियों के सहारे – ‘दुःख के सागर में कूदा/ सुख के मोती लेने को/ मैं डूब गया मणि पाकर/ कुछ रहा नहीं देने को |’
‘एक स्वप्न’ दो दल वाली कविता है | कविता में यथेष्ट पुष्प सौन्दर्य है | स्वप्न में भी हुई भूल कवि की सचेतक दृष्टि का परिचायक है | प्रायः लोग भूलों पर परदे डाल दिया करते हैं किन्तु यहाँ स्वीकारोक्ति प्रशंसनीय है | स्वप्न में प्रकट हुई प्रमदा की माया के आगे भी सजग दृष्टि विजित दिखती है क्योंकि वह उसकी वक्र दृष्टि को भेदने में सक्षम हो जाता है किन्तु फिर भी वह पूछता है – ‘कहाँ रहती हो क्या है नाम/ बताओ अपना सुन्दर धाम’ यहाँ कवि ने उसके सौन्दर्य की बानगी तो फिर भी दे ही दी है यथा- ‘तिल छोटा सा चमक रहा था/ उसके अधरों के कुछ नीचे/ मानो श्वेत कमल पर भौंरा/ बैठा हो निज आँखें मींचे |’ श्वेत कमल निर्दोष सौन्दर्य का अनूठा उदाहरण है |
‘मत सुनो प्रिय मीत मेरे गीत’ गीत का उद्गम पीड़ा, व्यथा, करुणा | जीवन के विभिन्न प्रकार के संकुल दुःख दिखाई देते हैं | चूँकि प्रिय को वह प्रेम करता है और उसे दुखी नहीं करना चाहता | इस गीत का यह अंतिम चरण दृष्टव्य है- ‘सोचता था जिंदगी में शांति का आभास लूँगा/ जिंदगी में उलझनों से मैं क्षणिक अवकाश लूँगा/ आद्र नयनों की पहेली बूझ लूँ कैसे बता दो ?/ आज मानस मध्य में मृदुगीत फिर उलझन बने हैं |’
वेदना और अश्रु एक दूसरे के पूरक हैं | हाँ कवि इन दोनों का कहाँ और कैसे अनुभव करता है यह अलग बात है | यह गीत मैंने स्वयं श्रीप्रकाश जी के मुख से सुना है | वे पढ़ते हुए भाव विभोर हो जाते थे | मुखमंडल पर प्रत्येक पंक्ति के भावों का उतार चढ़ाव स्पष्ट देखकर ऐसा लगता था कि कविता स्वयं निकल रही है | श्रीप्रकाश जी तो निमित्त मात्र हैं – ‘आज सुस्मृत हुई जिंदगी की व्यथा/ प्यार की गीतिका अधूरी कथा/ जागरण ले जगाकर कहे छेड़कर/ सांस की श्रृंखला पर व्यथित गीत को/ राग देते रहो मैं पिघलती रहूँ |’
श्रीप्रकाश जी जिज्ञासु प्रवृत्ति के हैं उनकी यह प्रवृत्ति उनके काव्य में सर्वत्र देखने को मिलती है | वे प्रश्नों और उनके उत्तर में कभी स्वयं तो कभी समाज से तो कभी परासत्ता से आँखें मिलाकर पूछते हैं | उनका यही स्वरुप इस कविता में दिखता है तभी तो वे काल की गति मापने का साहस करते हैं जबकि काव्यगति के प्रश्न पर प्रायः लोग मौन रह जाते हैं किन्तु यहाँ कवि उसके स्वागत में नवल संगीत देने की बात करता है | ‘शांतिवन के इस भवन में आज निश्चय ही विरल हो/ इसीलिए ही मैं तुम्हारे आगमन के स्वागतम में/ नित्यप्रति कवि को नवल संगीत देना चाहता हूँ |’ मैथिलीशरण गुप्त की यह रचना – ‘दोनों ओर प्रेम पलता है/ सखि पतंग तो जलता ही है दीपक भी जलता है’ समर्पण और उत्सर्ग की भावना से प्रेरित यह गीत सुन्दर है – ‘मृत्यु पाकर मुक्ति का सन्देश मैं गलहारता हूँ/ इसलिए ही मैं तड़पता मृत्यु को स्वीकारता हूँ/ पार उसके प्यार मेरा – मैं शलभ हूँ |’ जैसा कि अंत में शीर्षक से पता चलता है कि कवि परमसत्ता के मधुर व मृदुल सचेतन आनंद को पाकर तृप्त होना चाहता है इस संसार से मुक्ति की अंतिम कामना लेकर |
‘आओ मेरे राम !’ भारतीय परिदृश्य के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालती है | समाज में फैली विकृतियों पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है | मूल्यों का क्षरण उसे आहत करता है | वह राम, कृष्ण के रूप में दैवी शक्तियों का आह्वान करता है जिससे शकुनि, धृतराष्ट्र, दुस्शाशन, कंस, अर्जुन का मोह, कालिय नाग, इंद्र का संत्रास, अनेक नकारात्मक शक्तियों से देश को मुक्ति दिलाना चाहता है किन्तु अर्जुन का गांडीव हुंकार भर रहा होता तो कृष्ण को गीता ज्ञान सुनाने की आवश्यकता न पड़ती तथापि जहाँ सत्य की मर्यादा खंडित होती है तो श्रीप्रकाश जैसा कवि चुप कैसे रह सकता है | ‘निशागीत’ प्रियतम से जीवन के यथार्थ का प्रतिवेदन किन्तु प्रेम की असफलता ‘जो कभी भी मिल न पायें हैं हमेशा वे किनारे |’ कवि हृदय की करुणा को उजागर करती है |
‘अर्चना’ मां शारदे की सुन्दर वंदना है किन्तु प्रतिभा के साथ घोर का प्रयोग कुछ कम सम्यक लगता है | ‘छल गया जीवन फिर फिर बार’ यहाँ नियति के आगे सामान्यजन एक कन्दुक की भांति ही तो रह गया है जबकि असमय मृत्यु क्रूर यथार्थ का बोध कराती – तभी तो वह कह उठता है – ‘कैसे कह दूँ यह संसृति अपना साथी है’ जटिल समस्याओं में उलझा जीवन सच्चे साथी को नहीं तलाश पाता – ‘सुख के सब साथी दुःख में न कोई’ इस बात को स्वीकारना ही पड़ता है क्योंकि संसार स्वार्थी है और यही वास्तव है | कवि फिर भी सजग है | जागरण की बात करता है | ‘मेरे साथी सो मत जाना’ सांसों के रहने तक निरंतरता बनाये रखना ही जीवन का दूसरा नाम है | संघर्ष व सत्कर्म के साथ वह आगे बढ़ना चाहता है तभी तो कहता है – ‘साथी जीवन तो बस श्रम है’ प्रातः से संध्या तक दिन से रात तक सर्दी गर्मी वर्षा में श्रम का संबल ही तो है जो उसे बढ़ने की प्रेरणा देता है | पतझड़ के बाद बसंत का आना आशा के पथ पर चलना ही तो जीवन की सार्थकता है |
‘अव्यक्त होते हुए भी’ सबकुछ व्यक्त करने की काव्यकला में श्रीप्रकाश जी बेजोड़ दिखते हैं | क्योंकि घनीभूत पीड़ा आँसू बनकर बहती है किन्तु पाषाण पिघलकर कविता बन जाय यह अव्यक्त नहीं रह जाता | जो पीड़ा पहुंचाए उसे गीतों से अभिनंदित करना वह भी मूक लेखनी से और समस्त जगत को कल्याण के सावन में हराभरा कर दे तो बताओ अव्यक्त क्या है |
कर्मपथ पर निरंतर चलने और निस्वार्थ सेवा की बात जो ‘मैं दीपक’ के माध्यम से कवि ने आजीवन कर्म कामना करना ही जीवन है ऐसा रूपक सुन्दर बन पड़ा है | घोर तम का प्रभात वेला में क्षरण तो सिद्ध है हाँ हम स्वयं को भूल बैठे हैं | अतः दुःख का कारण भी स्पष्ट है पाश्चात्य प्रभाव और उसकी अंधी दौड़ में व्यवस्था का बिखराव |
बहुधा नियति की विडंबना और व्यंग्य पर जब दृष्टि जाती है जिस पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है और लिखा जायेगा | नियति नहीं, नियति का खेल मायाजाल विरोधाभास यह सब हमें देखने को मिलता है | कवि कर्म में निरत रहते हुए भी उससे मुक्त होना चाहता है | यह उसकी नियति ही तो है | जीव जंगम और नियति का वह संगम चिरंतन है बंधू |
स्व और परा यह विभाजन ही प्रश्नों का मूल उद्गम है | ‘आत्मीय विरोधाभास’ कविता में यह स्पष्ट दिखता है | यह अनंत उसी तरह सत है जिस तरह स्व | सारे प्रश्न विघटन से उत्पन्न हुए हैं अतः स्व को समझने के पश्चात कुछ समझने का न अवसर बचता है और न स्थान |
‘इस स्वयं में क्या छिपा है’ कवि का अपना दार्शनिक विवेचन है अतः वह अपने सारे प्रश्नों का हल खोजता फिरता है कस्तूरी मृग की भांति | प्रकृति के नाना व्यापारों में वह स्वयं को निहारता है और फिर ऐसा नहीं समझकर दूसरे आलंबनों को आंकने लगता है | जिज्ञासु मन अनंत काल से प्रकृति के रहस्यों को जानने को उत्सुक रहा है | वह कभी स्वयं से पूछता है तो कभी सृष्टिकर्ता से तो कभी प्रकृति के नाना रूपों से | ठीक उसी प्रकार कवि ने विश्वसंचालक से सीधे वार्ता का माध्यम बनाकर इस संसार के प्रत्येक रहस्य को जानना चाहा है- ‘देखने को लोचनों की दृष्टि आकुल हो रही है/ चल रहे क्रमपार क्या है बुद्धि व्याकुल हो रही है/ विश्व संचालक बता दे, विश्व मन के पार क्या है ?/ देख लूँ अपने स्वयं में विश्व में उस पार क्या है ?’ जीवन संघर्ष को सहर्ष अपना कर कवि ने जो कविता कर डाली है उसे सहेज न सका क्योंकि जीवन न वह प्याली ढुलका दी यही सत्य है | ढुलकी प्याली में पुनः करुणा भरने का तभी तो वह कहता है – ‘सुख को छोड़ दिया इस मन ने/ पीड़ा को गलहार किया है/ मैंने दुःख से प्यार किया है |’
वेदना, करुणा में अलौकिक मिलती हुई दिखाई देती है तभी तो वह सत्यम-शिवम्-सुन्दरम की खोज़ में आगे बढ़ता है | उसकी सजगता का प्रमाण यह है कि खो न जाना | जीवन के विभिन्न विकारों व विघ्न बाधाओं में मिलन की सीमा तक अपने गंतव्य को पाने तक सजग रहने की आत्मप्रेरण शक्ति ही तो उसे निरंतरता प्रदान करती है | ‘सुस्मृति के स्वर’ कविता में कवि ने अपने विगत जीवन चित्रों का अंकन किया है | मुंशी प्रेमचंद ने कहा है कि विगत कितना ही दुखद हो किन्तु उसकी स्मृतियाँ सुखद होतीं हैं | ‘डुबो लेते दृग बीते चित्र/ स्मृति उठ गिरती है लाचार |’ और इन सुखदुख की स्मृतियों के कारण ही कवि को अतीत से प्यार होना स्वाभाविक है क्योंकि जो हृदय में है उसी के परिचय से अनजान कोई कैसे रह सकता है | हाँ गीत गाने की इच्छा है वह भी साथ साथ चलते हुए यह अच्छा सुयोग है | ‘जीवन का कैसा है प्रभात’ पढ़कर ऐसा लगता है कि कवि ने प्रभात को भी प्रश्नों के घेरे में खड़ा कर दिया है क्योंकि विकास यहाँ निर्विवाद नहीं दिखता वरन तमस्छाया उसे आच्छादित कर रही है यही अद्भुतता उसे उलझन में डाल देती है जिस पर अंतर्दर्शन मुस्कुरा उठता है |
‘क्रांतिबीज’ निश्चित रूप से एक जागरण गीत है जहाँ मानवता की उद्दीप्त ऊर्जा निरंतर प्रवाहित होती है | उत्साह और ओज प्रधान यह रचना श्रेष्ठ है | यहाँ शासक और शासित का द्वन्द्ध दिखता है | महलों और झोपड़ियों के बीच संघर्ष का स्पष्ट संकेत है | चंचल प्रधान स्वभाव तो है ही मन का जैसे स्थिर जल में तरंगें प्लवित होती रहती हैं उसी प्रकार मन की चंचलता उसकी नियति है | उसकी चंचलता को नियंत्रित करने का प्रयास इस गीत के माध्यम से सुन्दर बन पड़ा है - ‘विश्व के मोहक सुखों के साथ उड़कर/ मन विहग कुछ देख ले इस पार मुड़कर/ खेलता क्यों आत्मसंयम राह पर/ भाग जाता तू स्वयं की चाह पर |’
इस ग्रन्थ की अंतिम रचना ‘कौन अपना है यहाँ पर’ जैसे इस विश्व को मिथ्या नश्वर और सारहीन व प्रपंचयुक्त बताया है फिर भी विश्व में कोई तो होगा अपना जो यह आभास दिलाता है कि यह नश्वरता में भी निरंतरता का समावेश करने वाला कोई तो है – जो अपना लगता ही है |
सृजन की इस श्रृंखला में और भी कड़ियाँ पिरोते हुए श्रीप्रकाश जी साहित्य साधना करते रहे | उनके बारे में बहुत कुछ इन कविताओं ने कह दिया है | वे कोटिशः बधाई के पात्र हैं मेरी ओर से उन्हें हार्दिक बधाई, साधुवाद !
‘यह जीवन का गीत इसे प्रतिपल बजने दो,
हार हृदय के तार-तार पर स्वर तिरने दो,
श्वासों का संगीत निरंतर घोल रहा है-
कानों में मृदुगीत सरस सौरभ घुलने दो |’

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